मात्र 13 एम्बुलेंस के भरोसे पूरा अम्बाला जिला
अंबाला स्वास्थ्य विभाग की ‘साँसें’ अटकीं
विभाग की लापरवाही का खामियाजा भुगत रहे गरीब मरीज
भुगतान न होने से एजेंसी ने रोकी मरम्मत; 17 लाख के फेर में 20 दिनों से वर्कशॉप में खड़ी हैं 7 एम्बुलेंस
अंबाला। स्वराज भास्कर । जिले की सरकारी स्वास्थ्य सेवा इस समय खुद ‘वेंटिलेटर’ पर नजर आ रही है। स्वास्थ्य विभाग द्वारा निजी सर्विस एजेंसी का 17 लाख रुपये का बकाया भुगतान न किए जाने के कारण पिछले 20 दिनों से 7 एम्बुलेंस वर्कशॉप में धूल फांक रही हैं। एजेंसी ने साफ कर दिया है कि जब तक पिछला भुगतान नहीं होता, नई मरम्मत नहीं की जाएगी। नतीजतन, पूरे जिले का भार अब मात्र 13 एम्बुलेंस पर आ गया है, जिससे आपातकालीन सेवाएँ पूरी तरह चरमरा गई हैं।
मरीजों पर दोहरी मार: रेफरल का बढ़ता बोझ और एम्बुलेंस का अभाव
जिले के तीन मुख्य नागरिक अस्पतालों—सिटी, कैंट और नारायणगढ़—में केवल 2-2 एम्बुलेंस तैनात हैं। आंकड़े बताते हैं कि कैंट और सिटी अस्पतालों से हर महीने लगभग 200 गंभीर मरीजों को उच्च केंद्रों (PGI आदि) के लिए रेफर किया जाता है। एम्बुलेंस की कमी के कारण:
- एक ही एम्बुलेंस को दिन में 4 से 5 चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
- गाड़ियों के अत्यधिक संचालन से बची हुई 13 एम्बुलेंस भी जर्जर होने की कगार पर हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में एम्बुलेंस पहुँचने में घंटों की देरी हो रही है।
गरीब मरीजों के लिए ‘काल’ बनी सिस्टम की सुस्ती
यह संकट सबसे ज्यादा उन गरीब परिवारों पर कहर बनकर टूट रहा है जो निजी एम्बुलेंस का खर्च उठाने में सक्षम नहीं हैं। खबर के अनुसार, एम्बुलेंस मिलने में देरी के कारण मासूम बच्चों और गंभीर मरीजों की जान पर बन आ रही है। निजी एम्बुलेंस संचालक केवल रेफरल केस के लिए अनुबंधित हैं, लेकिन दुर्घटनाओं या अन्य इमरजेंसी में सरकारी एम्बुलेंस न मिलने पर गरीब मरीज बेबस नजर आते हैं।
“अक्टूबर में एक 5 वर्षीय मासूम को PGI रेफर किया गया था, लेकिन एम्बुलेंस खराब होने और दूसरी एम्बुलेंस के देरी से आने के कारण इलाज में देरी हुई। यह सिस्टम की विफलता का जीता-जागता उदाहरण है।”
विभागीय पक्ष: फाइलों में अटका भुगतान
इस पूरे मामले पर मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. राकेश सहल का कहना है कि लंबित भुगतान के लिए बिल प्रोसेस कर दिए गए हैं। हालांकि, एजेंसी का दावा है कि उन्हें भुगतान के संबंध में अब तक कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली है। सवाल यह उठता है कि क्या सरकारी बजट की प्रक्रियाओं के बीच आम आदमी की जान की कीमत इतनी सस्ती हो गई है?